माहे अय्याम-ए-फ़ातिमियाह

ये महीना इस्लामिक साल का छटा महीना है। नाज़रीन की ख़िदमत में इस माह की खुसूसियात और उनकी क्या क्या मुनासीबत है उसका तज़क़िरा यहां करना चाहूंगी। वैसे तो कई रिवायतें हैं,मगर इस महीने में जो बहुत अहम हैं उसका ज़िक्र यहां हो रहा है। तो आइए देखते हैं के वो हमारे लिए ईमानी, ईतेकादी और मारिफ़त के ऐतबार से कितनी अहम हैं।

3 जमा उल आख़िर   :  ये वो तारीख़ है जिस दिन सिद्दीक़ा-ए-ताहिरह फ़ातिमा ज़हरा (स) जिगर गोशाए रसूल की वफात की तारीख़ है। वफात की एक दूसरी रिवायत से 13 जमादी’उल अव्वल भी बताई गई है। हर शिया इस ग़म को मानता है। ये वो बीबी है जिसके लिए क़ुरान में सुरह अहज़ाब की 33वीं आयत, आयते ततहीर आई …..

” إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُذۡهِبَ عَنكُمُ ٱلرِّجۡسَ أَهۡلَ ٱلۡبَيۡتِ وَيُطَهِّرَكُمۡ تَطۡهِيرٗا ”

क़ुरान की इस आयते ततहीर जिसमे अहलेबैत ए.स. की तहारत और पाकीज़गी का ऐलान हो रहा है। खुद हमारे रसूल ने बताया के फ़ातिमा मेरे जिगर का टुकड़ा है, जिसने इसे राज़ी किया उससे मैं राज़ी जिसने इसे रुलाया उसने मुझे रुलाया। मगर अफसोस के रसूल की बेटी को बाद रसूल सब भूल गए। कभी दरबार में बुला कर, कभी बाज़ार में, कभी दर ए ज़हरा पर आकर इस उम्मत ने ज़हरा(स) को तरह तरह से अज़ीयत दी। रसूल की बेटी को अपने बाप पर रोने भी न दिया गया। बाबा के ग़म और मुनाफ़िक़ीन के ज़रिये दी गई अज़ीयत, जलते हुए दरवाज़े के गिरने से लगी चोट की वजह से 11 हिजरी में सिर्फ 18 साल की उम्र में आपकी रेहलत हुई।

“तोड़ा नबी की बेटी पे दर वा मुसीबता, थर्राया दरदो ग़म से जिगर वा मुसीबता !
दुर्रे लगाए बानिए शर वा मुसीबता,  ज़ुल्म और सोगवार पेदर वा मुसीबता !
यूं पसलियां फिगार हुईं ग़म गुज़र गया,
और बत्न में भी मोहसिने मासूम मर गया !”

13 जमा उल आख़िर   :   हज़रत अली ए स. की ज़ौजा जनाबे उम्मुल बनीन की वफात की तारीख है। आपका पूरा नाम फ़ातिमा और कुन्नीयत उममुल बानीन है। आपके 4 बेटे करबला में शहीद होने से शहीद बेटों की मां का शरफ और इफ्तेखार हासिल हुआ। आपके बड़े बेटे हज़रत अब्बास इब्ने अली, अलमदारे हुसैन ए.स. थे। आपकी आरामगाह मदीना मुनववारा के बक़ी में है।

20 जमा उल आख़िर   :   जनाबे फ़ातिमा ज़हरा (स) की विलादात इस माह की 20 तारीख़ को एलाने नबूवत के 5 साल पहले 605 हिजरी में मक्का में हुई।आपकी मां का नाम ख़दीजतुल कुबरा था। आपकी शादी 9 साल की उम्र में हज़रत अली (अ) से हुई। आपके 2 बेटे इमाम हसन(अ) , इमाम हुसैन(अ) और 2 बेटियां जनाबे ज़ैनब(स), जनाबे उम्मे कुलसुम(स)  थीं, एक बेटे हज़रत मोहसिन की शहादत पेट में ही हो गई थी। फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा की परवरिश पैग़म्बर की देख रेख में घर में ही हुई। आपने ईमान और यकीन के साथ नशोनुमा पाई, वफ़ा, इख़लास और ज़ोहद के साथ परवान चढ़ीं। ये रौशन हो गया के आप वो दुख़तरे शरफ़ ओ मंज़िलत हैं जिसकी नज़ीर हव्वा की बेटियों में कहीं नज़र नहीं आती।

अल्लाह तबारक व तआला ने तमाम आलमें इंसानियत के रुश्द व हिदायत के लिये इस्लाम में कई ऐसी हस्तियों को पैदा किया जिन्होंने अपने आदात व अतवार, ज़ोहद व तक़वा, पाकीज़गी व इंकेसारी, जुरअतमंदी, इबादत, रियाज़त, सख़ावत और फ़साहत व बलाग़त से दुनिया ए इस्लाम पर अपने गहरे नक्श छोड़े हैं, उन में बिन्ते रसूल (स), ज़ौज ए अली और मादरे गिरामी शब्बर व शब्बीर अलैहिमुस सलाम भी उन ख़ुसूसियात की हामिल हैं, जिन पर दुनिया ए इस्लाम को फ़ख़्र है। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) की इबादतों पर हक़्क़ानीयत को नाज़ है, उन की पाकीज़गी पर इस्मत को नाज़ है, उन के किरदार पर मशीयत को नाज़ है और इंतेहा यह है कि उन की शख़्सियत पर रिसालत को नाज़ है।

अपने बाबा के नक्शे क़दम पर चलते हुए जिंदगी के हर मरहले तय किए।आपने हक के इलावा कभी ज़बान नहीं खोली। ख़ुदा से बिलकुल नज़दीक क़यनात की रंगीनियों और बलाओं से अच्छी तरह वाक़िफ़, सब्र और तहम्मूल के साथ अपना हर फ़रीज़ा अदा किया और बेशुमार मुश्किलाते जिंदगी के बावजूद ज़िक्र इलाही में मसरूफ रहीं। इन्हों ने ही सिखाया के बलाओं पर सब्र और आसाइशों में ज़िक्रे खुदा कैसे होता है। और क़ज़ा ओ क़द्र इलाही पर किस तरह राज़ी रहा जाता है। आपके अज़ीम जूद ओ ईसार के लिये वही वाक़्या काफी है जो हम क़ुरान के सुरह दहर की तफसीर के ज़िक्र में देखते हैं।

जनाबे फ़ातिमा ज़हरा (स) एक बेहतरीन बेटी, वफादार शरीके हयात, एक बा अज़मत शफीक़ माँ थीं। शादी के बाद आप घर के सारे काम ख़ुद अपने हाथों से अंजाम देतीं  थीं , हज़रत अली (अ) घर का पानी भरते और जंगल की लकड़ी वग़ैरह लाते थे और हज़रत ज़हरा (स) अपने हाथों से चक्की चला कर आटा पीसतीं,खाना पकाती, कपड़े धोती, शौहर की ख़िदमत अंजाम देतीं और बच्चों की हिफ़ाज़त व परवरिश करतीं मगर उस के बावजूद कभी अपने शौहर से शिकायत नही की, क्योंकि उन्हें अपने बाबा के चमन की आबयारी करनी थी, अपने हर अमल को दीन के मानने वालों के लिये मशअले राह बनाना था।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) उन हज़रात में से हैं जिनकी मवद्दत और मुहब्बत तमाम मुसलमानों पर वाजिब की गई है जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम ने फ़रमाया (सूरह शूरा आयत 23) – तर्जुमा, आप कह दीजिए कि मैं तुम से इस तबलीगे रिसालत का कोई अज्र नही चाहता सिवाए इसके कि मेरे क़राबत दारों से मुहब्बत करें।

कनीज़ाने ज़हरा(स) , जनाबे फ़ातिमा ज़हरा(स) के फज़ायल मुख्तसर में लिखना मुझ नाचीज़ के लिए मुमकिन ही नहीं। बस इक छोटी सी कोशिश की है। शायद बीबी क़ुबूल कर लें।

या ज़हरा ,या फ़ातिमा, या उम्मेअबीहा दुख़तरे पैगंबर ऐ सिद्दीक़ाय ताहिराह (स) शफी ए रोज़ जज़ा बीबी वक्त मदद है , आपसे ये इस्तगासा है की इस मुश्किल आलमे दौरां में आप हमारी मदद कीजिए। हमें इतना मज़बूत, हौसला मंद और अपना वफादार बनाइए के हम इस पुरआशोब माहौल में अपनी नई नस्ल की हिफाज़त और बेहतर परवरिश कर सकें और आपकी कनीज़ कहलाने के लायक बन सकें।

“तू हमें हिफ्ज़ और अमां दे दे ,  अपनी चादर का सयबां दे दे ,
तेरी कुदरत में क्या नही बीबी ,  तू जिसे चाहे दो जहां दे दे …
वक्त आखिर है बस मेरा बीबी ,  अन गिनत हैं मेरे गुनाह बीबी ,
वास्ता तुझको तेरे बच्चों का ,  बख्शवाना मेरे गुनाह बीबी …”

 

इल्तेमास ए  दुआ…

क़मर बानो
( नोएडा एक्सप्रेसवे )

(For the month of Jamadi’ul Akhir)