मक़सद -ए- सफर -ए- इमाम हुसैन (अ.स.)

क़मरी महीनों में कुछ महीनों को बहुत फज़ीलत हासिल है, लेकिन मोहर्रम का महीना एक इम्तियाज़ी हैसियत रखता है। इधर लबों पर मोहर्रम का नाम आया और उधर आँखें अशकबार हुईं, व दिल में ग़मों अनदोह का एक  सैलाब उठा क्योंकि यह वह महीना है जिसमें नबी ए अकरम(स.) के नवासे इमाम हुसैन(अ.स.) ने अपनी व अपने अज़ीजों व दोस्तों की कुर्बानी देकर अपने नाना के दीन को नई जिंदगी दी।

इस्लाम आया था इंसानियत का पैग़ाम देने के लिए, इस्लाम आया था इंसान को ख़ुदा के करीब करने के लिए, इस्लाम आया था इंसान की हैवानियत ख़त्म करने के लिए – और एक ऐसा माआशरा तशकील करने के लिए जिसमें इंसान इंसान के काम आए। जहाँ हर तरफ प्यार मोहब्बत की खुशबू फैली हुई हो। जहाँ हर इंसान को एक दूसरे से हमदर्दी हो और इन सब के साथ ख़ुदा की बंदगी हो।

इमामे वक्त इमामे हुसैन(अ.स.) के दौर में मावीया का बेटा यज़ीद शाम के तख़्त पर बैठ गया था। उसने शरई क़वाईन में तब्दीलिया शुरू कर दी, जैसे शराब नोशी को मामूली गुनाह करार दिया, सौतेली मां से निकाह जायज़ करार दिया। लेकिन मुसलमानों की आँखों में इतने दबिश पर्दे पड़ चुके थे कि यज़ीद की इन हरकतों के खिलाफ कोई आवाज़ उठाने वाला नहीं था।

मदीने में इमाम हुसैन(अ.स.) ने ज़ी हैसियत मुसलमानों को यह बताया कि — यज़ीद अपनी कारगुज़ारीओं पर पर्दा डालने की तरफ से मुझसे बैअत चाहता है, लेकिन मैं उसकी बैअत नहीं करूंगा, क्योंकि वह इस्लाम को ग़लत रास्ते पर ले जा रहा है, वह उम्मत को गुमराह कर रहा है, मैं उम्मत की इस्लाह को निकल रहा हूं। मदीने के मुसलमानों में से कुछ ने इमाम हुसैन(अ.स.) को तरके  सफर की राय दी, कुछ ने ख़ामोशी अख्तियार करने की सलाह दी। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि हम आपके हमराह चलते हैं।

ईमाम का मक़सद हाकिमे वक्त के खिलाफ़ कोई बग़ावत करने का नहीं था। इसीलिए उन्होंने अपने साथ घर की खवातीन, बच्चे, अज़ीज़ों अक़ारीब व चंद अपने साथियों को लिया ताकि वक्त के मुवर्रख़ीन इस काफिले को फौजी दस्ता ना क़रार दें। फिर आपने मदीने से मक्के का रुख़ ईख्तियार किया, जहाँ हज अदा करने के लिए दुनिया के कोने कोने से मुसलमान हाजिर हो रहे थे। 28 रजब को इमाम हुसैन मदीने से चलकर शाबान के शुरू में मक्का तशरीफ लाए और वहां 4 माह से कुछ ज़्यादा अरसा क़याम किया और हाजियों के दरमियान तबलीग़ का काम शुरू किया। आपने उन्हें यह बताया कि यज़ीद का कोई फेल शरीयत के मुताबिक नहीं है। वह अपने ग़लत कामों पर मेरी बैअत की मोहर लगाना चाहता है। मुझे इनकारे बैअत है। मैं उम्मत को यही बताने निकला हूं कि उन्हें गुनाहों से बचाना है। लेकिन मुसलमान उस वक्त ग़फलत की नींद सोए हुए थे। उन्हें ना उम्मत की इसलाह की फिक्र थी ना इसकी परवाह थी कि दीन के नाम निहाद रहनुमा, दीन को किस तरफ लिए जा रहे हैं। उनका मक़सद बस ये था के उनका हज अदा हो जाए। इसकी दलील यह है कि मक्के में चार माह से ज़्यादा अर्से तक तबलीग़ करने के बाद भी इमामे हुसैन (अ.स) का साथ देने के लिए एक हाजी भी उनकी मदद के लिए नहीं खड़ा हुआ।

यज़ीद ने यह इल्म होने पर की इमामे हुसैन (अ.स) ने इनकारे बैअत कर दिया है और वह उस वक्त मक्के में हैं, उनके क़तल के लिए हाजियों के भेष में कातिलों को मक्के भेज दिया। इमामे हुसैन(अ.स) ने जब यह बात महसूस की तो उन्होंने हज को उमरा में तब्दील किया। उमरा  के अरकान अदा करके 8 ज़िलहीज को मक्के में से कूच किया और 2 मोहर्रम को कर्बला पहुंचे और 10 मोहर्रम को यज़ीदी फौज ने आपको, आपके अज़ीज़ों व अकारिब को ना सिर्फ शहीद किया बल्कि अहले हरम को कैद करके वो ज़ुल्म ढाए जिसकी मिसाल दुनिया की तारीख़ में नहीं मिलती।

हक़ीक़त यह है कि अगर इमामे हुसैन(अ.स.) यह क़ुरबानी ना देते तो हम दीन ए इस्लाम को आज ना जाने किस शक्ल में पाते। उसकी दलील यह है कि हुकमराने दीन अपने गुनाहों को और अपने माफाद को शरीयत का रंग दे रहे थे। लेकिन मुसलमान इतना ग़ाफिल था या हुक्मरानों से इतना खौफ ज़दा था कि उसके खिलाफ कोई आवाज़ उठाने वाला न था। इमामे हुसैन(अ.स) की शहादत के बाद मुसलमान को क़यामत तक के लिए हक़ और बातिल में तमीज़ हो गई। आज कोई भी ताकतवर से ताकतवर हुकमरॉन इस्लामी क़वानीन मे तबदीली की हिम्मत नहीं कर सकता। कोई भी वक्त का यज़ीद अपने गुनाहों को शरीयत का जामा नहीं पहना सकता। शायद इसीलिए मौलाना मोहम्मद अली जौहर साहब ने फरमाया —

क़तले हुसैन असल में मरगे यज़ीद है …………

        इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद …………

 

दुआओं में याद रखें….

खामिसा हैदर नक़वी  

(नोएडा एक्सप्रेसवे)

(For the month of Muharram)