” माहे शाबान “

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ 

शाबान का महीना इसलामिक कैलेंडर का आठवां महीना है। इसे शबे बरात का महीना भी कहते हैं। रिवायत में ये महीना हमारे नबी हज़रत मुहम्मद सल्ललाहो व अलैही वसल्लम के नाम से मंसूब है। ये माहे शाबान बड़ा अज़ीम बा बरकत, तौबा, अस्तग़फ़ार और बख़्शिशों का महीना है। इस माह में रखे गए रोज़ों और इबादतों की बहुत फ़जीलत है। अमीरुल मोमिनीन(अ.स) ने फरमाया है जो शख़्स मोहब्बते रसूल और तकर्रुब ख़ुदा के लिए शाबान में रोज़ा रखे तो ख़ुदा ए त’आला उसे अपना तकर्रुब अता करेगा, क़यामत के दिन उसे इज़्ज़त व एहतराम मिलेगा और जन्नत का हक़दार होगा। इस महीने की अहमियत इस लिए भी अज़ीम है के 15 शाबान की शब, “शबे बरात” की रात है, जो बे इंतेहा फ़ज़ीलतों, तौबा, बख़्शिश और अल्लाह से क़ुरबत की रात है। जिस तरह माहे रमज़ान में रोज़े और तिलावते क़ुरान का हुक्म है माहे शा’बान में भी इसकी बड़ी अहम्मिय्यत है कि रोज़े रखे जाएं और तिलावते क़ुरान की जाए ताकि इस्तिक्बाले रमज़ान की तय्यारी हो जाए और नफ़्स को इबादात की आदत हो जाए। 

शाबान की पहली तारीख़ विलादत हज़रत ज़ैनब(स ए) है। आप हमारे नबी की नवासी, इमाम अली(अ.स) और जनाबे फातिमा(स.ए) की बड़ी बेटी और इमाम हुसैन की छोटी बहन थीं। आपका नाम पैगंबरे इस्लाम ने ज़ैनब रखा था। आप आलमा ग़ैर मोअलमा थीं। हज़रत अली की ख़िलाफ़त के दौरान आप औरतों को क़ुरान की तालीम दिया करती थीं। लोग आपसे दरसे जिंदगी लिया करते थे। आपको सानिए ज़हरा और शरीक़तुल हुसैन के नाम से भी जाना जाता है। तबलीग़ी इस्लाम में आपकी तक़रीर ने बड़ा गहरा असर छोड़ा बनी उमय्या को रुसवा किया कूफे के आवाम में जुररत पैदा करदी। आपने हाकिम ए वक़्त को बे नक़ाब और शर्म सार किया। आपके ख़ुत्बों से लोगों को अली याद आने लगे। आप बहुत ज़्यादा मासाएब का शिकार हुई इसलिए उम्मुल मासाएब भी कहा जाता है। ये वही बीबी ज़ैनब हैं जो करबला की जंग के बाद एक इस्लामिक लीडर बनकर उभरी थीं। जिन्हेंने करबला की जंग के बाद भाई की क़ुरबानी के मक़सद को और दीन इस्लाम को जिंदा रखा। दीने इस्लाम की तबलीग़ का ज़रिया,फर्श आज़ाए हुसैन क़ायम की गईं।

کبھی حسین کبھی فاطمہ کبھی زینب

جہاں پہ جیسی ضرورت تھی بن گئین زینب

سوال تھا کے نہ رہ جائے ظلم پردے میں 

حیات مقصد  شبّیر بن گئیں زینب

   शाबान की 3 को हमारे तीसरे इमाम, इमाम हुसैन इब्न अली(अ:स) की विलादत का दिन है। इमाम हुसैन अली ओ फातिमा के फरजंद के साथ फरजंद रसूल भी कहलाते थे। आपकी विलादत के दौरान ही रसूले ख़ुदा ने आपकी शहादत की ख़बर दी और नाम हुसैन रखा।  इमाम हुसैन(अ.स) से बेइन्तेहा मोहब्बत की वजह कर रसूलल्लाह फरमाते थे के हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हूं। आप असहाबे किसा में से एक थे, मुबाहले में भी आप शरीक थे और अपने भाई इमाम हसन(अ.स) के हमराह थे। इस तरह आयते ततहीर जो अहलेबैत की शान में नाज़िल हुई उसमे आप भी शामिल हैं। आपको आपके नाना रसूले ख़ुदा ने “सय्यदो शबाब अहले जनान” का लक़ब दिया, और हजरत अली(अ.स) ने “सैय्यददुष शोहदा” का लक़ब अता किया। अमीरुल मोमेनीन के ख़िलाफ़त के दौर में उनके साथ थे, माविया की वफ़ात के बाद इमाम हुसैन ने यज़ीद की बैअत को शरीयत के खिलाफ़ करार दिया। क़ूवते इरादा,अज़म का मज़हर आपको विरासत से मिला, जिन्होंने तारीख़ बदल दी, जिंदजी के मफ़हूम को बदल दिया और तबलीग़ ए इलाही में कुफ्र के आगे डट कर खड़े रहे। आपने बनी उमय्या के आगे सर झुकाने पर शहादत को तरजीह दी। सदाये हक़ को बुलंद करने के लिए जान की बाज़ी लगा दी। इस तरह आप तारीख़ के औराक पर फातेह अकबर बनकर उभरे। इमाम हुसैन(अ.स) ने बशरीयत जिंदगी के हर गोशे को दरसे इंसानियत दिया है और हर साहिबे फिक्र को अपनी अज़मत के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया। ज़िल्लत की जिंदगी से इज्ज़त की मौत को बेहतर बताया। इमाम हुसैन(अ.स)  तमाम कमालात ओ फज़ाएल में तमाम इंसानों से बरतर थे क्योंकि आप की कुन्नियत “अबा अब्दिल्लाह” है बज़ाहिर इस कुन्नीयत के अंदर एक ऐसी ख़ुसुसियत है जो आपको तमाम कमालात का मरकज़ करार देती है। अल्लाह ने इमाम हुसैन(अ.स) के लिए एक ख़ुसूसी हिसाबो किताब रखा है जो किसी नबी या मासूम के लिए नहीं रखा। इमाम हुसैन(अ.स) की ज़ियारत को बेहतरीन और ब फज़ीलत तरीन इबादत का दर्जा अता है। 

یہ کلمہء حق لا الہ تحریر نہ ھوتا  –  قرآن بھی یہ لائقِ تعظیم نہ ہوتا  

مٹ جاتا تیرا دین بھی اے ربِ ذوالجلال  –  زہرا کی نسل میں اگر شبّیر نہ ہوتا

आपको असहाब भी ऐसे अता हुऐ जो वफादारी, जज़्बाए ईसार के साथ उलुल अम्र करते हुए बातिल कुवतों से टकरा गए। हमारा सलाम हो उनपर जिन्होंने दुनिया की आराइशो को छोड़ कर आख़िरत के अज़ीम दर्जात और इनामात को मुक़द्दस समझा।

   शाबान की 4 को विलादत हज़रत अब्बास(अ.स) है। आप हज़रत अली के बेटे और इमाम हसन, इमाम हुसैन, जनाबे ज़ैनब ओ उम्मे कुलसूम के छोटे भाई थे। आपकी मां हज़रत उम्मुल बनींन थीं। हजरत अली(अ.स) ने अल्लाह से आपके पैदा होने की तमन्ना ज़ाहिर की थी। हज़रत अब्बास ने ये बतलाया के वो अपने भाई, मौला, रहबर, इमाम और मुक़तदी के साथ किस क़दर वफादार हैं। इमाम हुसैन(अ.स) के बरपा करदह इंकलाब में हज़रत अब्बास(अ.स) का बहुत अहम किरदार है। अपनी पूरी जिंदगी इमाम हुसैन(अ.स) और उनकी हिफाज़त में गुज़ार दी। हमारा सलाम हो अबुल फज़लिल अब्बास पर जिसने अपनी जान क़ुर्बान कर अपने भाई और वक्त के इमाम से हमदर्दी और वफादारी की। आपको कई लक़ब से जाना जाता है- क़मरबनी हाशिम,अबुल फज़ल,बाबुल हवाएज, अलमदार, सक्का। आपका सबसे मशहूर लक़ब बाबुल हवाएज है। आपको शख़्सी क़ूवत, इरादे में पोख़तगी, शुजाअत, दिलेरी और वफादारी बाबा अली(अ.स) से विरासत में मिली थी और इस सिफत को अपनी वाल्दा उम्मुल बनींन के खानदान से भी पाया था। तारीख़ आपकी शुजाअत और दिलेरी के वक़्यात से भरी हुई हैं।  

لشکرِ شاہِ شہیداں کا علمدار ہوں میں 

کاروانِ شہِ مظلوم کا سردار ہوں میں 

ثانیءشیرِخدا، دین کی دیوار ہوں میں 

پیاس پانی کی بجھائے جو وہی پیاس ہوں میں

میں تمنائے علی ہوں سخی عباس ہوں میں

   7 शाबान विलादत हज़रत क़ासिम इब्न हसन(अ.स) है। आप इमाम हुसैन(अ.स) के बड़े भाई इमाम हसन(अ.स) के बेटे थे।

   11 शाबान विलादत हज़रत अली अकबर(अ.स) है। आप इमाम हुसैन(अ.स) के बेटे थे। आपकी मां का नाम उम्मे लैला था। आप बिलकुल हमशक्ल पैगंबर थे।

   14 शाबान की रात रोज़ शबे बरात है, बहुत मुकद्दस और अज़ीम फज़ीलतों की रात है। पूरी क़ौम मुसलएमां आज की रात अपने मरहूमीन के लिए फातेहा करते हैं उनकी मग़फ़ेरत की दुआएं करते हैं। घरों में चिराग़ाँ करते हैं।आज की रात मग़फ़ेरतऔर बख्शीश की रात है। जितना हो सके हम इस रात को इबादत में गुज़ारते हैं, तौबा ओ अस्तग़फ़ार करते हैं। अपने इमाम ए वक्त को अपना हाल ए दिल अरीज़े में लिखते हैं।

   15 शाबान हमारे इमाम ए वक्त साहिबे असर (अ.ज.फ) की विलादत्त का दिन है। आपका इसमें शरीफ मोहम्मद है। आपके कई अलकाब है- मेहदी,आखरुज्जमां,क़ायम, इमाम असर, बक़ियातुल्ला, हुज्जतुल्लाह। आप शिआने हैदर ए कर्रार के वो आख़री  इमाम और दीन इसलाम के आख़री रहनुमा हुज्जते ख़ुदा हैं। आप हुक्म ख़ुदा से परदाये ग़ैब में हैं और हुक्म ख़ुदा से वो ज़ाहिर होंगे। जब इमाम ज़ुहूर करेंगे तो हाथ में हज़रत अली(अ.स) की ज़ुल्फ़िक़ार होगी। ख़ाने काबा मुक़ाम ज़हूर होगा और आप ख़ुत्बा फरमाएंगे। हज़रत ईसा उनके हमराह होंगे। दुनिया से ज़ुल्म मिट जायेगा फिर ज़मीन को इंसाफ की खुशख़बरी दी जाएगी मज़लूमों के साथ इंसाफ होगा। ज़ालिम हाज़िर किए जायेंगे तमाम मज़हब ख़त्म हो जायेगा, दुनिया पाकबाज़ हो जाएगी। आपके अहदे  हुकूमत में मुकम्मल अमन और चैन रहेगा। हमारा फ़र्ज़ है की हम इमाम की सीरत ओ सफ़ात से आगही हासिल करे। अमले सालेह के ज़रिए परहेज़गारी को अपना पेशा बनाते हुऐ इमाम के लिए अपने को नमूनाए अमल बनाएं।

غلاف کعبہ پہ لوگ شدّت سے اپنی نظریں جما رہے ہیں

خدا نے رکھا ہے اس میں شاہد ابھی تلک پردہ دار باقی

تمہارا مشتاق ہے زمانہ اے آنے والے اب آبھی جاؤ 

جہاں یہ انساں سکون پائے نہیں ہے کوئی دیار باقی

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ख़ाकसार ….
क़मर बानो
( नोएडा एक्सप्रेसवे )