आमद ए इमाम-ए-अस्र (अ.त.फ)

انکو بے دیکھے تو پلٹا ہے زمانہ سارا

پردہء غیب سے آئینگے تو کیا حال ہوگا

पलक  झपकते ही मौला का दीदार हो जाए हर दिल की यही तमन्ना है…

انے والا ھے وہ جررار زمانے والو

اُنکے انے کے ھے اسار زمانے والو

روک لو ظلم کی رفتار زمانے والو

اب تو ھو جاو خبردار زمانے والو

نام کو بھی یہ کھی کفر نہی چھوڈیگا

بت کدیں مے یہ صنم مسلے علی توڈےگا

15 शाबान वो तारीख़ है के जिस दिन कायनात पर शबाब आया,कोहसारो मे खुश आमदीद की सदाएं गूंजी। सब्ज़ा ज़ारो ने अपनी रंगीनी से ज़मीन के हर हिस्से को मुज़ाईयन कर दिया आबशारो ने सलवात का विर्द किया क्योंकि इस दिन क़यामत तक के लिए दीन के मुहाफ़िज़ ने फर्शे ज़मींन को क़दम बोसी का शर्फ बख्शा,इस दिन रसूल का आख़िरी जानशीन तशरीफ लाए। इस दिन 1 लाख 24 हज़ार पैग़म्बरो के समर ने दुनिया मे आँखे खोली। यानी हमारे और आप के इमाम, इमामे ज़माना आलमे नुरानियत से आलमे वजूद मे तशरीफ लाए। इस लिए हम खुशियाँ मनाते है, चिराग़ा करते है, ये दुआओ का दिन है। हमारी दुआऐं उन तक पोहोचती है। हम अरिज़ा भेज ते है। ताकि हमारे दिल की बात उन तक पोहचे।

اس بزم معتبر کی فضیلت کے میں نثار

خود انبیاء بھی فخر کریں جس میں بیٹھ کر

دیکھیںگے وہ ضرور میری داستانِ غم

میں نے عریضہ لکھا ہے مجلس میں بیٹھ کر

خامسا حیدر نقوی –