” माहे शववाल ”   

                                بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ 

माहे शववाल क़मरी महीने का 10 वा महीना है। इसको ईद का महीना भी कहते है। तारीफ उस ख़ुदा की जो दो जहाँनो का मालिक है, जिसके दस्ते क़ुदरत मे तमाम आलम की चाबी है।

30 रोज़े रखने के बाद जो दिन आता है उसकी खुशी मे परवर दीगार ने इंसानो के लिए ईद का तोहफा दिया। ईद का दिन बहुत मुबारक दिन है। ईद की सुबह उठ कर ख़ुरमा खाना चाहिए। क्यूं की इस दिन रोज़ा रखना हराम है। फितरा निकालना चाहिये और उसको मुस्तहक़ तक पोहचाना चाहिये। ताकि जिसको फितरा मिले वो भी अपनी ईद खुशियो के साथ मनाले। ईद के दिन हसनैन के कपड़े  (शहजादी ए कोनैन की दुआ से) जन्नत से आये थे। जो रिज़वान (फरिश्ता) लेकर आये थे। हमको  पाक साफ कपड़े पहन कर ही नमाज़ पढ़नी चाहिये।

इस महीने की 15 तारीख़ शहादत इमाम जाफर ए सादिक़ (अ.स) है। इमाम की शहादत ज़हर से हुई थी। इमाम जाफर ए सादिक़ (अ.स) के ज़माने मे अब्बासी खिलाफत इख़्तादार मे थी और उस ही सीलसिले के एक खलीफा मंसूर की शै पर आप को ज़हर से शहीद किया था। इमाम जाफर ए सादिक (अ.स) ने इल्म को बहुत अहमियत दी। जो मदरसे आप के जद ने क़ायम किये थे उनको फ़रोग दिया। और यूनिवर्सिटी खोली। इल्म की तबलीग़ के लिए बेशुमार लाइब्रेरीज़ खोली। इनके शागिर्द खुद उस्ताद बने, आपके एक शागिर्द इब्ने हय्यान – father of modern chemistry कहलाते है। मदीने मे बड़े बड़े मदरसे थे जो वहां की हुकूमत ने मिसमार कर दिये मगर अभी निशानियाँ मौजूद है। उसमे दीनी तालीम के साथ तमाम उलूम की तालीम  दी जाती थी।

ईद के महीने मे ही जंगे ओहद हुई थी। जिसमे मुसलमानो ने माले ग़निमत के लालच मे रसूल को ज़ख़्मी हालत मे अकेला छोड़ दिया था। और जंग को शिकस्त के दरवाज़े पर पोहचा दिया था। मौला अली ने रसूल को हीफाज़त के साथ महफूज़ जगह पर पोहचा दिया।

मुझे भी अपनी दुआओं में याद रखें……

ख़ामिसा हैदर नक़वी  ( नोएडा एक्सप्रेसवे )