” माहे ज़ीक़ाद “

                                بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ 

    क़मरी महीने का ये ग्यारवा महीना है| इस महीने की भी इस्लाम में बहुत अहमियत है| इस महीने की 25 तारीख को काबे के नीचे ज़मीन बिछाई गई| काबा जिसे सब जानते हैं| जो अल्लाह का घर है| काबे को नस्ब करने के लिए हज़रत इब्राहीम को अल्लाह ने हुक्म दिया के मेरे घर काबे की तामीर करो| फिर हज़रत जीबराईल ने ज़मीन की निशानदेही कि| हज़रत इब्राहीम और  हज़रत इसमाईल ने मिल कर काबे की दीवारों की तामीर शुरू की| काबे के क़रीब एक मुक़ाम है जिसको मक़ामे इब्राहीम कहा जाता है| इस मक़ाम पर वो पत्थर है जिस पर खड़े होकर हज़रत इब्राहीम ने काबे की तामीर की| जिस पर हज़रत इब्राहीम के क़दमो के निशान आज भी मौजूद है| कहा जाता है जैसे जैसे काबे की दीवार ऊँची होती थी, उस ही मुनासेबत से ये पत्थर भी ऊंचा होता जाता था| ये ख़ुदा का करम है के परवरदिगार ने अपना घर ज़मीन पर बना कर हम बंदो को अपने घर की ज़ियारत का मौक़ा दिया | 

   ज़ीक़ाद के महीने की गयारह तारीख़ विलादत बा साआदत हमारे और आपके आठवे ईमाम, ईमाम अली रज़ा (अ.स) है| आपकी विलादत 153 हिजरी बा मक़ाम मदीनए मुनाववेरा में बरोज़ पंजशम्बा को हुई| इमाम की जब विलादत हुई तो ज़मीन पर आते ही आपने अपने दोनो हाथ ज़मीन पर टेक दिये| आपका सरे मुबारक आसमान की तरफ़ था और होठ जुंबिश कर रहे थे| ऐसा लगता था जैसे आप ख़ुदा से बाते कर रहे है|आपका नाम अली है|आपको रज़ा का लक़ब इस लिए मिला के आसमान और जमींन में ख़ुदा वन्दे आलम, रसूले अकरम, आइंममाये ताहेरीन सब ही आप से राज़ी थे| 

अक्सर लोगो के ज़हन में ये सवाल आता है के इमाम हुसैन (अ.स) की ज़ियारत के साथ ईमाम अली रज़ा की ही ज़ियारत क्यूँ पढ़ी जाती है| छटे और सातवे इमाम के ज़माने में हाकीमे वक़्त ने सादात के उपर बहुत ज़ुल्म किये थे इसके नतीजे मे शियाने अली मुख्तलिफ गिरोह में तक़सीम हो गए थे| कुछ तक़ईये में चले गए, कुछ ने छटे और सातवे  इमाम के दूसरे साहबज़ादों को अपना इमाम मान लिया था| एक गिरोह ऐसा था जिसने छटे और सातवे के साथ आठवे को अपना इमाम माना और बारवे इमाम तक ये सिलसिला चला| ये गिरोह बाद में असना अशरी कह लाया| इस ही लिए आठवे इमाम की ज़ियारत पढ़ी जाती है की ये ज़ाहिर हो जाए के ये ही गिरोह १२ इमामो का मानने वाला है।

   ज़ीक़ाद का महिना बरकत का महीना है| हज़रत अमिरूल मोमेनीन (अ.स) इरशाद फरमाते है के जो 25 ज़ीक़ाद को रोज़ा रखे और इसकी शब को ईबादत मे बसर करे, तो गोया उसने 100 साल की ईबादत की| आसमान से पहली रहमत बरसने का भी ये ही दिन है|

दुआ गो…..

ख़ामिसा हैदर नक़वी  ( नोएडा एक्सप्रेसवे )