” माहे रमज़ान उल मुबारक “

                                      بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ 

   हमदो सताईश तो बस उस ही परवरदीगार को ज़ेबा है जो लाशरीक है जिसने बंदो की सलामती के लिये सफ़ीने निजात बनाया। जिसने गुनाहों में जकड़े बे आसरा बंदो की रिहाई के लिए अस्तग़फार और तौबा को ज़रिया बनाया। जिसने अपने प्यारे और महबूब बंदो को तमाम इंसानियत के लिए नमूने अमल बना दिया। जिसने ज़िन्दगी के हर लम्हें में नेमतों की बारिश की। और नेमतों के साथ साथ उसने माफ़ी का दरवाज़ा ऐसे खुला रखा है, के हम किसी भी लम्हें तौबा करें वो कुबूल करता हैं। उसकी रहमानियत और रहीमियत की एक बहुत बड़ी दलील है के उसने इंसान को हर लम्हें की नेमतों को और अस्तग़फार की क़बूलियत के कुछ ऐसे बेशुमार मौक़े फ्राहम् फरमाय हैं जिसमे नेकियों के कई गुना जज़ा देता है। और अस्तग़फार करने पर बेशुमार गुनाहों को माफ करता है। रमज़ान का महीना एक ऐसा ही मौक़ा है जिसमे ख़ुदा की नेमतें हज़ारो रास्ते से आती है। ये ही नही परवरदिगार हमारे नेक अमल को पसंद करके लाखो फरीशतों को मामूर कर देता है जो हमारे हक़ मे दुआऐं करते हैं

     रमज़ान मे रोज़े रखने का मतलब ये नही है के सिर्फ खाना पीना तर्क किया जाए बल्कि अस्ल मक़सद ये के इंसान अपने हाथ पैरों को, अपनी ज़ुबान को, अपनी बासीरत अपनी समात् को, अपने नफ्स को पाको पाकीज़ा रखे, हर बुराई से अपने आप को दूर रखे। मासूमीन ने रमज़ान में यतीमों का, अज़ीज़ों का, ज़रुरत मंदो का ख्याल रखने की ताकीद की है। रमज़ान में रोज़ा अफ़्तार कराने और तिलावते कुरान का और सदक़ा देने का बेहद सवाब है।

    इस महीने की 15 तारीख और भी मुबारक है। जो योमे विलादते इमाम हसन (अ.स) है। माहे रमज़ान की 19, 21, 23 वी रात को शबे क़द्र कहा जाता है। 19 तारीख़ शबे ज़रबते हज़रत अली (अ.स) है। 19 की सहर मे हालते नमाज़ में इब्ने मुलजिम ने हज़रत अली के सरे मुबारक पर ज़हर आलूदा तलवार से ज़रबत लगाई जिसकी वजह से 21 रमज़ान को मौला अली की शहादत हो गई। 19, 20, 21 शबे मग़ है मोमिन को चाहिए के इन दिनों में गिरीओ ज़ारी करें, ख़ुदा की इबादत करें और कोई खुशी का काम ना करें। 23 रमज़ान की शब वो मखसूस शब है जिसमे क़ुरान नाज़िल हुआ। फ़ज़िलत के इताबार से इस शब का बहुत बुलंद मरतबा है। मासूमीन ने फर्माया है इस शब मे इबादत हज़ार रातो की इबादत से अफज़ल है। 25, 27, 29 और शबे ईद, ये सब रातें भी बहुत अफज़ल है। इसमे भी इबादत करें। ईद का चाँद देख कर ईद की ही शब मे फ़ितरा निकाल देना चाहिए। फ़ितरा वाजिब है। ईद की नमाज़ से पहले ही फ़ितरा मुसतहक तक पोहचा देना चाहिए।

   ये ख़ुदा का महीना है जिसमे इंसान ख़ुदा का मेहमांन है, शैतान इस महीने में क़ैद कर लिया जाता है। जन्नत के दरवाज़े इस महीने में खुले रहते है। बस बंदे को चाहिए के बुराइयों से अपने आप को बचायें।

मुझे भी अपनी दुआओं में शामिल रखें…… शुक्रिया

ख़ामिसा हैदर नक़वी  ( नोएडा एक्सप्रेसवे )